विस्तृत उत्तर
नारदजी दुखी मन के लिए कई जुड़े हुए उपाय बताते हैं। वे कहते हैं कि समस्त कर्म पुरुषोत्तम भगवान को समर्पित करना संसार के तीन तापों की औषधि है। भगवान की प्रसन्नता के लिए किए गए कर्म से भक्ति योग से संयुक्त ज्ञान मिलता है और साधक भगवान के नाम-गुण का कीर्तन तथा स्मरण करता है। आगे नारदजी अपने अनुभव से कहते हैं कि विषयभोग की कामना से व्याकुल चित्त के लिए हरि लीला का वर्णन संसार-सागर पार करने की नौका है। काम और लोभ से घायल मन को कृष्ण सेवा से जैसी प्रत्यक्ष शांति मिलती है, वैसी केवल यम-नियमादि योगमार्ग से नहीं मिलती। इसलिए दुखी मन की शांति भगवान की कथा, सेवा, स्मरण और समर्पण से जुड़ी है।
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