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विस्तृत उत्तर
गुणवैतृष्ण्य पुरुष में उत्पन्न वितृष्णा का भाव है। पाठ में कहा गया है कि पुरुष में वितृष्णा नाम से प्रसिद्ध भाव ही गुणवैतृष्ण्य कहलाता है। इसी प्रसंग में औपसर्गिक यानी विघ्नरूप सिद्धियों का वैराग्य द्वारा परित्याग करने की बात कही गई है। इसलिए गुणवैतृष्ण्य गुणों, ऐश्वर्यों और सिद्धियों के प्रति तृष्णा के अभाव तथा वैराग्यपूर्ण दृष्टि का नाम है।
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शास्त्रीय स्रोत
श्रीलिङ्गमहापुराण, पूर्वभाग, अध्याय 9, PDF पृष्ठ 56, श्लोक 54
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