विस्तृत उत्तर
आत्म-शुद्धि के पश्चात यजमान परब्रह्म परमात्मा की स्तुति करता है। वैदिक परंपरा में इसके लिए 8 विशिष्ट मन्त्रों का विधान है, जो ऋग्वेद एवं यजुर्वेद से संकलित हैं। इनमें से प्रथम मन्त्र यजुर्वेद (30.3) का अत्यंत प्रभावशाली मन्त्र है:
ॐ विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परा सुव। यद् भद्रं तन्न आ सुव॥
द्वितीय मन्त्र हिरण्यगर्भ सूक्त से है:
हिरण्यगर्भः समवर्त्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत। स दाधार पृथ्वीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम॥
इन मन्त्रों के सस्वर पाठ से यज्ञ मंडप का वातावरण पूर्णतः सात्विक एवं एकाग्र हो जाता है।





