विस्तृत उत्तर
हृदय ग्रंथि अज्ञान से बनी अहंकार और ममता की गाँठ है। जब जीव स्वयं को शरीर मानता है, तो उसके भीतर मैं और मेरा की धारणा मजबूत हो जाती है। यही अहंता और ममता हृदय की गाँठ कहलाती है। इसी से मोह, भय, क्रोध, आसक्ति और भोग की इच्छा जन्म लेती है। हंस गीता में भगवान बताते हैं कि इस ग्रंथि को साधारण बाहरी कर्मों से नहीं, बल्कि विवेक, शास्त्र-श्रवण, गुरु-उपदेश और आत्मज्ञान की तलवार से काटना पड़ता है। जब यह गाँठ कटती है, तब जीव मन और विषयों के चक्र से ऊपर उठकर मुक्त होता है।
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