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कुम्भक और ऐक्य📜 श्रीलिङ्गमहापुराण, पूर्वभाग, अध्याय 8, PDF पृष्ठ 51, श्लोक 111-112⏱ 1 मिनट पठन

ईश्वर और जीव का ऐक्य कैसे प्राप्त होता है?

अंतिम अपडेट: 29 मई 2026
संक्षिप्त उत्तर

केवल कुम्भक में समरस होकर हृदय में शिव का ध्यान करने से साधक ईश्वर और जीव के ऐक्य को प्राप्त करता है।

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विस्तृत उत्तर

ईश्वर और जीव का ऐक्य समरस अवस्था में शिवध्यान से प्राप्त बताया गया है। साधक रेचक और पूरक छोड़कर केवल कुम्भक में स्थिर रहे और समरस भाव से अपने हृदय में साक्षात् शिव का ध्यान करे। इस प्रकार समरस में स्थित विद्वान साधक ईश्वर और जीव के ऐक्य को प्राप्त होता है। उस ऐक्य से रसजनित ब्रह्मानन्द की प्राप्ति कही गई है।

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शास्त्रीय स्रोत
श्रीलिङ्गमहापुराण, पूर्वभाग, अध्याय 8, PDF पृष्ठ 51, श्लोक 111-112
उत्तर को थोड़ा और स्पष्ट करें

ईश्वर और जीव का ऐक्य कैसे प्राप्त होता है को संदर्भ सहित समझें

ईश्वर और जीव का ऐक्य कैसे प्राप्त होता है का सबसे सीधा सार यह है: केवल कुम्भक में समरस होकर हृदय में शिव का ध्यान करने से साधक ईश्वर और जीव के ऐक्य को प्राप्त करता है।

कुम्भक और ऐक्य जैसे विषयों में यह देखना जरूरी होता है कि बात किस परिस्थिति में लागू होती है, किन नियमों के साथ मान्य होती है और व्यवहार में इसका सही अर्थ क्या निकलता है. उपलब्ध स्रोत श्रीलिङ्गमहापुराण, पूर्वभाग, अध्याय 8, PDF पृष्ठ 51, श्लोक 111-112 इस दिशा को मजबूत आधार देता है।

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उत्तर का शास्त्रीय आधार देखने के लिए श्रीलिङ्गमहापुराण, पूर्वभाग, अध्याय 8, PDF पृष्ठ 51, श्लोक 111-112 के उल्लेख को ध्यान से पढ़ें।

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कुम्भक और ऐक्य श्रेणी के दूसरे प्रश्न इस उत्तर की सीमा और उपयोग दोनों स्पष्ट करते हैं।

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यदि विस्तृत विधि या पृष्ठभूमि चाहिए, तो नीचे दिए गए लेख पहले खोलें।

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