विस्तृत उत्तर
नारदजी बताते हैं कि सामान्य रूप से कर्म मनुष्यों को जन्म-मृत्यु वाले संसार में डालने वाले कारण बनते हैं। लेकिन वही कर्म यदि भगवान को समर्पित कर दिए जाएँ, तो वे बंधन का कारण नहीं रहते। वे रोग और औषधि का उदाहरण देते हैं: जिस पदार्थ से रोग हुआ हो, वही चिकित्सा पद्धति से प्रयोग करने पर रोग दूर भी कर सकता है। उसी तरह कर्म अपने आप बंधनकारी हैं, पर भगवान की प्रसन्नता के लिए किए जाने पर वे शुद्धि और ज्ञान का साधन बनते हैं। ऐसे कर्म से परा भक्ति योग से युक्त ज्ञान प्राप्त होता है। इसलिए कर्म से भागना उपाय नहीं बताया गया; कर्म को भगवान की ओर मोड़ना और समर्पित करना ही मुक्ति की दिशा है।
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