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श्रीमद्भागवत📜 श्रीमद्भागवत 1.5, श्लोक 32-35⏱ 1 मिनट पठन

कर्म बंधन से मुक्ति कैसे मिले?

अंतिम अपडेट: 29 मई 2026
संक्षिप्त उत्तर

कर्म बंधन से मुक्ति तब होती है जब वही कर्म भगवान की प्रसन्नता के लिए समर्पित होकर किए जाएँ।

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विस्तृत उत्तर

नारदजी बताते हैं कि सामान्य रूप से कर्म मनुष्यों को जन्म-मृत्यु वाले संसार में डालने वाले कारण बनते हैं। लेकिन वही कर्म यदि भगवान को समर्पित कर दिए जाएँ, तो वे बंधन का कारण नहीं रहते। वे रोग और औषधि का उदाहरण देते हैं: जिस पदार्थ से रोग हुआ हो, वही चिकित्सा पद्धति से प्रयोग करने पर रोग दूर भी कर सकता है। उसी तरह कर्म अपने आप बंधनकारी हैं, पर भगवान की प्रसन्नता के लिए किए जाने पर वे शुद्धि और ज्ञान का साधन बनते हैं। ऐसे कर्म से परा भक्ति योग से युक्त ज्ञान प्राप्त होता है। इसलिए कर्म से भागना उपाय नहीं बताया गया; कर्म को भगवान की ओर मोड़ना और समर्पित करना ही मुक्ति की दिशा है।

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शास्त्रीय स्रोत
श्रीमद्भागवत 1.5, श्लोक 32-35
उत्तर को थोड़ा और स्पष्ट करें

कर्म बंधन से मुक्ति कैसे मिले को संदर्भ सहित समझें

कर्म बंधन से मुक्ति कैसे मिले का सबसे सीधा सार यह है: कर्म बंधन से मुक्ति तब होती है जब वही कर्म भगवान की प्रसन्नता के लिए समर्पित होकर किए जाएँ।

श्रीमद्भागवत जैसे विषयों में यह देखना जरूरी होता है कि बात किस परिस्थिति में लागू होती है, किन नियमों के साथ मान्य होती है और व्यवहार में इसका सही अर्थ क्या निकलता है. उपलब्ध स्रोत श्रीमद्भागवत 1.5, श्लोक 32-35 इस दिशा को मजबूत आधार देता है।

इसी विषय पर 5 संबंधित प्रश्न और 6 विस्तृत लेख भी उपलब्ध हैं। इसलिए इस उत्तर को शुरुआती निष्कर्ष मानें और नीचे दिए गए अगले पन्नों से पूरा संदर्भ जोड़ें।

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उत्तर का शास्त्रीय आधार देखने के लिए श्रीमद्भागवत 1.5, श्लोक 32-35 के उल्लेख को ध्यान से पढ़ें।

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श्रीमद्भागवत श्रेणी के दूसरे प्रश्न इस उत्तर की सीमा और उपयोग दोनों स्पष्ट करते हैं।

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यदि विस्तृत विधि या पृष्ठभूमि चाहिए, तो नीचे दिए गए लेख पहले खोलें।

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