विस्तृत उत्तर
काव्या माता ने असुरों को शरण इसलिए दी क्योंकि वे उनके द्वार पर भयभीत, घायल और असहाय होकर आए थे। उस समय असुरों के गुरु शुक्राचार्य तपस्या के लिए दूर थे और देवताओं ने उन पर आक्रमण कर दिया था। सनातन धर्म में शरणागत की रक्षा को बड़ा धर्म माना गया है। काव्या माता ने असुरों को केवल अपने पुत्र के शिष्य समझकर नहीं, बल्कि शरणागत प्राणियों के रूप में देखा। उन्होंने स्पष्ट कहा कि जब तक वे उनके आश्रम में शरण लिए हुए हैं, वे उनकी रक्षा करेंगी। यही शरणागत धर्म आगे पूरे प्रसंग का केंद्र बन गया।
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