विस्तृत उत्तर
इस कथा के आधार पर इतना स्पष्ट है कि धुंधुकारी के मामले में श्राद्ध पर्याप्त नहीं हुआ। गोकर्ण ने उसे अनाथ समझकर गया में श्राद्ध किया और अन्य तीर्थों पर भी उसका श्राद्ध करते रहे। फिर भी धुंधुकारी प्रेत रूप में सामने आया। गोकर्ण ने आश्चर्य से पूछा कि गया पिंडदान के बाद भी मुक्ति क्यों नहीं हुई। धुंधुकारी ने कहा कि सैकड़ों गया-श्राद्ध से भी उसकी मुक्ति नहीं होगी। इसलिए गोकर्ण ने दूसरा उपाय खोजा। सूर्यदेव ने श्रीमद्भागवत सप्ताह का निर्देश दिया। सात दिन भागवत श्रवण के बाद धुंधुकारी मुक्त हुआ। कथा में श्राद्ध की अवमानना नहीं, बल्कि भारी कर्मफल वाले प्रेत के लिये भागवत सप्ताह की विशेष महिमा दिखाई गई है।
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