विस्तृत उत्तर
लक्ष्मणजी के क्रोधित वचन सुनकर गुरु विश्वामित्रजी, श्रीरघुनाथजी और सब मुनि मनमें प्रसन्न हुए और बार-बार पुलकित होने लगे। श्रीरामचन्द्रजीने इशारेसे लक्ष्मणको शान्त किया और प्रेमसहित अपने पास बैठा लिया।
चौपाई — 'गुर रघुपति सब मुनि मन माहीं। मुदित भए पुनि पुनि पुलकाहीं। सयनहिं रघुपति लखनु नेवारे। प्रेम समेत निकट बैठारे॥'
इसके बाद विश्वामित्रजी ने शुभ समय जानकर अत्यन्त प्रेमभरी वाणी बोले — 'उठहु राम भंजहु भवचापा। मेटहु तात जनक परितापा' — हे राम! उठो, शिवजीका धनुष तोड़ो और हे तात! जनकका सन्ताप मिटाओ।





