विस्तृत उत्तर
मंत्र जप के लिए आसन — शरीर की स्थिति ऊर्जा-संरक्षण और एकाग्रता दोनों को प्रभावित करती है:
पातञ्जल योगसूत्र (2.46-47) — आसन का सिद्धांत
स्थिरसुखमासनम्। प्रयत्नशैथिल्यानन्तसमापत्तिभ्याम्।
— आसन वह हो जो स्थिर और सुखद हो। प्रयत्न शिथिल हो और अनंत में चित्त लीन हो।
जप के लिए बैठने के आसन — श्रेष्ठता क्रम
1सिद्धासन (जप के लिए सर्वोत्तम — घेरण्ड संहिता)
एड़ी को 'सीवन' (perineum) पर रखकर बैठना। यह मूलाधार को सक्रिय करता है और ऊर्जा ऊर्ध्वगामी बनाता है। घेरण्ड संहिता: 'सिद्धासनं परं श्रेष्ठं।' — जप और ध्यान के लिए सिद्धासन सर्वश्रेष्ठ।
2पद्मासन (द्वितीय श्रेष्ठ)
दोनों पाँव विपरीत जाँघ पर। हठयोग प्रदीपिका: पद्मासन ध्यान और जप के लिए आदर्श — इसमें शरीर और मन दोनों सबसे जल्दी स्थिर होते हैं। यह अधिकांश साधकों के लिए सुलभ नहीं — अभ्यास से प्राप्त होता है।
3सुखासन (सामान्य साधकों के लिए)
साधारण क्रास-लेग्ड बैठना — यदि पद्मासन या सिद्धासन न हो तो यह स्वीकार्य। रीढ़ सीधी रखना अनिवार्य।
4वज्रासन (भोजन के बाद जप के लिए)
एड़ियों पर बैठना — पाचन के बाद जप के लिए उपयुक्त।
आसन-सामग्री (नीचे बिछाने के लिए)
मंत्रमहार्णव: ऊनी कम्बल (सर्वोत्तम), कुशासन (वेद-विहित), रेशमी कपड़ा (देवी-साधना)। प्लास्टिक-रबर — सख्त वर्जित।
भगवद्गीता (6.11-12) — स्थान का नियम
न बहुत ऊँचा न बहुत नीचा। कुश + मृगचर्म + वस्त्र — यह त्रिस्तरीय आसन आदर्श है।
जप में शरीर-मुद्रा
- ▸हाथ: गोमुखी में माला (थैली में ढकी हुई) — या गोद में हाथ
- ▸रीढ़: सीधी — झुकी हुई रीढ़ = ऊर्जा का क्षरण
- ▸आँखें: अर्धखुली या बंद
- ▸सिर: थोड़ा आगे झुका (जालंधर बंध — ऊर्जा को नीचे न जाने देता है)
लम्बे जप में
यदि एक ही आसन में 1-2 घंटे बैठना हो — पहले 5 मिनट शवासन में लेटकर शरीर ढीला करें, फिर आसन लगाएं।





