विस्तृत उत्तर
जप और भजन का संबंध भागवत पुराण और नारद भक्ति सूत्र में वर्णित है:
जप और भजन का अंतर
- ▸जप = एक मंत्र की आवृत्ति (संख्या निश्चित)
- ▸भजन = देव के गुणगान का गीत (कीर्तन)
भागवत नवधा भक्ति में दोनों — 'जपः' (जप) और 'कीर्तनम्' (भजन) — अलग-अलग अंग हैं।
जप के पहले या बाद में भजन
जप के आरंभ में मन को भजन से तैयार करें — फिर जप करें।
इष्ट देव अनुसार भजन
| देवता | भजन |
|-------|------|
| शिव | शिव तांडव स्तोत्र, ओम नमः शिवाय भजन |
| विष्णु/कृष्ण | हरे राम हरे कृष्ण, जय जगदीश हरे |
| दुर्गा | जय अम्बे गौरी, दुर्गा चालीसा |
| हनुमान | हनुमान चालीसा |
| गणेश | जय गणेश जय गणेश देवा |
जप के दौरान
जप के समय भजन न गाएं — जप एकाग्र चित्त से। भजन पूजा के आरंभ या समापन में।
नारद भक्ति सूत्र
गानं नाम।' — भगवान के नाम का गायन स्वयं भक्ति है। भजन में भाव > स्वर।





