विस्तृत उत्तर
पंचगव्य विधि महापातक-प्रायश्चित के लिए बताई गई है। इसमें रुद्रगायत्री से कपिला गाय का मूत्र, गन्धद्वार मंत्र से पृथ्वी-संपर्करहित गोबर, तेजोऽसि शुक्रं मंत्र से घी, आप्यायस्व मंत्र से दूध, दधिक्राव्ण मंत्र से ताजा दही और देवस्य त्वा मंत्र से कुशजल लेना कहा गया है। इन सबको स्वर्ण, चाँदी या ताँबे के पात्र में, या कमल अथवा पलाशपत्र में इकट्ठा कर अघोर मंत्र से अभिमंत्रित करना चाहिए। फिर उसमें ब्रह्मकूर्च और सभी रत्नों सहित सोना डालना बताया गया है। बाद में उपवास के बाद ब्रह्मकूर्च-विधि से बने पंचगव्य का पान करना कहा गया है।
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