विस्तृत उत्तर
धुंधुकारी को पापी व्यक्ति के मृत्यु-पश्चात कष्टों का उदाहरण बनाया गया है। हत्या के बाद वह अपने कुकर्मों से भयंकर प्रेत बना। वह बवंडर के रूप में दसों दिशाओं में भागता रहता था। उसे शीत और ताप सताते थे। वह भोजन और जल के बिना भूख-प्यास से व्याकुल रहता था और ‘हा दैव’ कहकर पुकारता था, पर उसे कहीं आश्रय नहीं मिला। बाद में जब वह गोकर्ण से बोलता है, तो बताता है कि उसने अपने ही दोष से ब्राह्मणत्व नष्ट किया, उसके कुकर्मों की गिनती नहीं और वह दैवाधीन कर्मफल के कारण प्रेत योनि में वायु पर निर्भर होकर जी रहा है।
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