विस्तृत उत्तर
परीक्षित के गंगातट पर बैठने का कारण अभी उत्तर के रूप में नहीं, बल्कि शौनकजी के प्रश्न के रूप में आता है। शौनकजी पूछते हैं कि पांडव वंश के गौरव को बढ़ाने वाले सम्राट परीक्षित ने किस कारण राज्यलक्ष्मी का त्याग किया और गंगाजी के तट पर मृत्यु तक अनशन का व्रत लेकर बैठ गए। वे यह भी कहते हैं कि शत्रु उनके चरणों पर धन रखकर अपने भले के लिए प्रणाम करते थे, वे वीर और युवक थे, फिर उन्होंने राज्य और प्राणों के साथ वैभव क्यों छोड़ना चाहा। शौनकजी आगे कहते हैं कि भगवान के आश्रित लोग संसार के कल्याण और दूसरों के हित के लिए जीवन धारण करते हैं; फिर ऐसे व्यक्ति ने शरीर क्यों त्यागना चाहा। इसलिए यह जिज्ञासा रखी गई है, पूरा कारण आगे बताया जाना है।
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