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विस्तृत उत्तर
प्राकृत सर्ग को पुरुषाधिष्ठित, ईश्वरकृत, अबुद्धिपूर्वक उत्पन्न और कल्याणकारी प्राथमिक सर्ग कहा गया है। इससे पहले सृष्टि-क्रम में प्रकृति, महत्तत्त्व, अहंकार, तन्मात्राएँ, पंचमहाभूत, इन्द्रियाँ, मन, ब्रह्माण्ड अण्ड और उसके आवरणों का वर्णन आता है। इन सबके बाद सूतजी इस पूरी सृष्टि-प्रक्रिया को प्राकृत प्राथमिक सर्ग के रूप में सुनाया हुआ बताते हैं।
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शास्त्रीय स्रोत
श्रीलिङ्गमहापुराण, पूर्वभाग, अध्याय 3, PDF पृष्ठ 24, श्लोक 39
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