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प्रकृति तत्त्व📜 श्रीलिङ्गमहापुराण, पूर्वभाग, अध्याय 3, PDF पृष्ठ 20, श्लोक 1-4⏱ 1 मिनट पठन

प्रकृति को लिंग क्यों कहा गया है?

अंतिम अपडेट: 29 मई 2026
संक्षिप्त उत्तर

प्रकृति को लिंग कहा गया है क्योंकि प्रधान प्रकृति शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गन्धादि से संयुक्त उत्तम लिंग बताई गई है।

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विस्तृत उत्तर

प्रकृति को लिंग इसलिए कहा गया है क्योंकि प्रधान प्रकृति शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध आदि से संयुक्त बताई गई है। वही उत्तम लिंग कहलाती है। लिंगतत्त्व को जगत् का उत्पत्तिस्थान, पंचभूतात्मक, स्थूल, सूक्ष्म और जगत् का विग्रह कहा गया है। यह प्रकृति शिव से प्रकाशित और निर्गुण शिव से उत्पन्न मानी गई है।

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शास्त्रीय स्रोत
श्रीलिङ्गमहापुराण, पूर्वभाग, अध्याय 3, PDF पृष्ठ 20, श्लोक 1-4
उत्तर को थोड़ा और स्पष्ट करें

प्रकृति को लिंग क्यों कहा गया है को संदर्भ सहित समझें

प्रकृति को लिंग क्यों कहा गया है का सबसे सीधा सार यह है: प्रकृति को लिंग कहा गया है क्योंकि प्रधान प्रकृति शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गन्धादि से संयुक्त उत्तम लिंग बताई गई है।

प्रकृति तत्त्व जैसे विषयों में यह देखना जरूरी होता है कि बात किस परिस्थिति में लागू होती है, किन नियमों के साथ मान्य होती है और व्यवहार में इसका सही अर्थ क्या निकलता है. उपलब्ध स्रोत श्रीलिङ्गमहापुराण, पूर्वभाग, अध्याय 3, PDF पृष्ठ 20, श्लोक 1-4 इस दिशा को मजबूत आधार देता है।

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उत्तर का शास्त्रीय आधार देखने के लिए श्रीलिङ्गमहापुराण, पूर्वभाग, अध्याय 3, PDF पृष्ठ 20, श्लोक 1-4 के उल्लेख को ध्यान से पढ़ें।

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यदि विस्तृत विधि या पृष्ठभूमि चाहिए, तो नीचे दिए गए लेख पहले खोलें।

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