विस्तृत उत्तर
प्रलय के समय संसार विनाश की अवस्था में बताया गया है। देवता ऋषियों के साथ जनलोक और बाद में सत्यलोक चले गए। अनावृष्टि के कारण स्थावर पदार्थ सूख गए। पशु, मनुष्य, वृक्ष, पिशाच, राक्षस और गन्धर्व आदि क्रम से सूर्य की किरणों से दग्ध हो गए। इसके बाद चारों ओर समुद्र ही समुद्र व्याप्त हो गया। इसी प्रलय-सागर के बीच विश्वात्मा, सर्वात्मा और नारायण रूप विष्णु जल में शयन करते हैं, और आगे ब्रह्मा-विष्णु का संवाद तथा ज्योतिर्मय लिंग का प्राकट्य होता है।
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