विस्तृत उत्तर
गोकर्ण आत्मदेव को पुत्र-मोह इसलिए छोड़ने को कहते हैं क्योंकि आत्मदेव इसी मोह से गहरे दुख में पड़े थे। वे पूछते हैं कि पुत्र किसका और धन किसका है। स्नेह में पड़ा मनुष्य दीपक की तरह रात-दिन जलता रहता है। वे कहते हैं कि यह मेरा पुत्र है, ऐसा अज्ञान छोड़ देना चाहिए, क्योंकि मोह से नरक की प्राप्ति होती है। शरीर भी नष्ट होने वाला है, इसलिए पत्नी-पुत्र आदि में स्थायी ममता रखना सही नहीं। गोकर्ण आत्मदेव को शरीर को हड्डी-मांस-रक्त का पिंड मानकर आत्माभिमान छोड़ने, संसार को क्षणभंगुर देखने और भगवान की भक्ति में लगने का उपदेश देते हैं। पुत्र-मोह छोड़ना यहाँ वैराग्य और मुक्ति की दिशा में पहला कदम है।
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