विस्तृत उत्तर
राजा अम्बरीष की भक्ति अनन्य, निष्काम और आत्मनिवेदनमयी थी। वे केवल पूजा के समय भक्त नहीं थे, बल्कि उनका पूरा जीवन भगवान की सेवा में लगा था। उन्होंने मन को श्रीकृष्ण के चरणों में, वाणी को भगवान के गुणगान में, हाथों को मंदिर-सेवा में, कानों को हरिकथा में और नेत्रों को भगवान के दर्शन में लगाया। उनके पास अपार धन और राज्य था, पर वे उसे भगवान की संपत्ति मानते थे। इसी भक्ति से प्रसन्न होकर विष्णु ने सुदर्शन चक्र को उनकी रक्षा में नियुक्त किया। अम्बरीष की भक्ति वैष्णव परंपरा में आदर्श मानी जाती है।
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