विस्तृत उत्तर
श्रीराम-लक्ष्मण ने गुरु विश्वामित्रजी की आज्ञा से जनकपुर का भ्रमण किया। बागों, तालाबों और सरोवरों को देखा। फिर राजा के सुन्दर बाग (पुष्पवाटिका) में गये जहाँ वसन्त ऋतु छायी हुई थी।
चौपाई — 'भूप बागु बर देखेउ जाई। जहँ बसंत रितु रही लोभाई। लागे बिटप मनोहर नाना। बरन बरन बर बेलि बिताना॥'
अर्थ — उन्होंने जाकर राजाका सुन्दर बाग देखा, जहाँ वसन्त-ऋतु लुभाकर रह गयी है। मनको लुभानेवाले अनेक वृक्ष लगे हैं। रंग-बिरंगी उत्तम लताओंके मण्डप छाये हुए हैं।
बाग में नये पत्ते, फूल, फल, सुन्दर वृक्ष, कोयल, तोते, चकोर, मोर नाच रहे थे। बीचोबीच सुहावना सरोवर था जिसमें मणियों की सीढ़ियाँ, निर्मल जल, रंग-बिरंगे कमल, पक्षी और भँवरे थे।





