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विस्तृत उत्तर
साधुधर्म वह धर्म है जो श्रुति और स्मृति से विहित हो, वर्णाश्रम से सम्बद्ध हो और शिष्टाचार के अनुकूल हो। पाठ में साधुधर्म की यही परिभाषा दी गई है। इससे पहले साधु को अपने-अपने आश्रम के धर्मों का साधन करने वाला बताया गया है। इसलिए साधुधर्म शास्त्र, वर्णाश्रम व्यवस्था और श्रेष्ठ आचरण के मेल से समझा जाता है।
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शास्त्रीय स्रोत
श्रीलिङ्गमहापुराण, पूर्वभाग, अध्याय 10, PDF पृष्ठ 59, श्लोक 22
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