विस्तृत उत्तर
नारदजी कहते हैं कि संसार के लोग स्वभाव से विषयों में फँसे हुए हैं। यदि धर्म के नाम पर उन्हें निंदित या सकाम कर्म की आज्ञा मिल जाए, तो वे उसे ही मुख्य धर्म मान बैठते हैं और उसके निषेध को स्वीकार नहीं करते। इसलिए नारदजी व्यासजी से कहते हैं कि गुणों से नचाए जा रहे और पारमार्थिक बुद्धि से रहित लोगों के कल्याण के लिए भगवान की लीला का सामान्य रूप से वर्णन करें। आगे वे बताते हैं कि बुद्धिमान मनुष्य को उस वस्तु की प्राप्ति के लिए प्रयत्न करना चाहिए जो कर्मफल से अपने आप नहीं मिलती। विषय-सुख तो समय और कर्म के फेर से वैसे ही मिल जाते हैं जैसे दुख बिना प्रयास आ जाता है। इसलिए सकाम कर्म में अटकना आध्यात्मिक लक्ष्य से दूर कर सकता है।
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