विस्तृत उत्तर
सप्तऋषि हिंदू धर्म की सर्वश्रेष्ठ ऋषि-परंपरा के सात महान तपस्वी हैं, जिन्हें वेदों के मंत्रद्रष्टा माना जाता है। 'ऋषि' का शास्त्रीय अर्थ है — जो वैदिक मंत्रों को साक्षात देखते हैं। ये सात ऋषि प्रत्येक मन्वंतर में बदलते हैं। विष्णु पुराण (3.1.32) के अनुसार वर्तमान सप्तम वैवस्वत मन्वंतर के सप्तऋषि ये हैं:
१. वशिष्ठ — राजा दशरथ के कुलगुरु और भगवान राम के आदि-गुरु।
२. कश्यप — देवों, दैत्यों और समस्त प्राणियों के पितामह।
३. अत्रि — जिनके पुत्र दत्तात्रेय (विष्णु-अंश), चंद्रमा (ब्रह्मा-अंश) और दुर्वासा (शिव-अंश) हैं।
४. जमदग्नि — भगवान परशुराम के पिता।
५. गौतम — न्यायशास्त्र के प्रणेता।
६. विश्वामित्र — पूर्व में राजा थे, तपस्या से ब्रह्मर्षि बने। गायत्री मंत्र के द्रष्टा ऋषि।
७. भारद्वाज — वैदिक ज्ञान के महान संरक्षक, जिनके आश्रम में भगवान राम वनवास के दौरान गए थे।
(नोट: कुछ अन्य पुराणों में क्रतु, पुलह, पुलस्त्य, अत्रि, अंगिरा, वशिष्ठ और मरीचि — ये अन्य नामावली भी मिलती है। ग्रंथ-भेद से नाम अलग हो सकते हैं।)
सप्तऋषि तारामंडल — आकाश में सात तारों का जो समूह उत्तर दिशा में रात को दिखाई देता है, उसे सप्तऋषि तारामंडल (Ursa Major) कहते हैं।
पूजा का विधान:
ऋषि पंचमी — भाद्रपद शुक्ल पंचमी को ऋषि पंचमी मनाई जाती है। इस दिन सप्तऋषियों की विशेष पूजा की जाती है। मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने और सप्तऋषियों की पूजा करने से जाने-अनजाने में किए गए पाप कर्मों से मुक्ति मिलती है।
पूजा में — 'कश्यपोत्रिर्भरद्वाजो विश्वामित्रोथ गौतमः। जमदग्निर्वसिष्ठश्च सप्तैते ऋषयः स्मृताः।' — इस श्लोक का उच्चारण करते हुए सात ऋषियों को पुष्प, अक्षत और जल अर्पित करें।
नित्य स्मरण — प्रातः उठते समय पृथ्वी को प्रणाम करने की परंपरा में सप्तऋषियों का स्मरण शुभ माना गया है। इनके नाम का जप प्रतिदिन करना अत्यंत पुण्यकारी है।





