विस्तृत उत्तर
शालिग्राम भगवान विष्णु का स्वयंभू (self-manifested) स्वरूप माना जाता है। यह नेपाल की गंडकी नदी (काली गंडकी) में पाया जाता है और इसमें प्राण प्रतिष्ठा की आवश्यकता नहीं होती — यह स्वतः पवित्र और पूज्य है।
नित्य सेवा — हाँ, अनिवार्य
पद्म पुराण और वैष्णव परंपरा के अनुसार शालिग्राम की नित्य सेवा अनिवार्य है। यह सामान्य मूर्ति से भिन्न है क्योंकि इसे साक्षात् विष्णु का जीवित स्वरूप माना जाता है।
नित्य सेवा में क्या करें
- 1प्रातः स्नान — शालिग्राम को प्रतिदिन पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर) या कम से कम शुद्ध जल से स्नान कराएं।
- 2तुलसी दल — तुलसी पत्र अवश्य चढ़ाएं। बिना तुलसी शालिग्राम पूजा अधूरी मानी जाती है।
- 3चंदन — चंदन तिलक लगाएं।
- 4भोग — नित्य भोग (फल, मिठाई या तुलसी जल) अर्पित करें।
- 5दीपक — घी का दीपक जलाएं।
यदि नित्य सेवा संभव न हो
- 1गंभीर स्थिति — यदि किसी कारण (बीमारी, यात्रा) नित्य सेवा संभव न हो तो:
- ▸किसी अन्य परिवार के सदस्य से सेवा कराएं।
- ▸तुलसी जल और दीपक न्यूनतम है।
- 1दीर्घकालिक असमर्थता — यदि लंबे समय तक सेवा संभव न हो तो शालिग्राम को किसी मंदिर या योग्य ब्राह्मण परिवार को सौंपना उचित है। उपेक्षित शालिग्राम रखना दोषपूर्ण माना जाता है।
- 1गरुड़ पुराण में कहा गया है कि शालिग्राम की उपेक्षा से पाप लगता है।
विशेष ध्यान
- ▸शालिग्राम को कभी भूमि पर न रखें — ऊंचे आसन पर रखें।
- ▸शालिग्राम को हाथ में लेकर स्नान कराएं, जबरदस्ती रगड़ें नहीं।
- ▸एकादशी को विशेष पूजा करें।
- ▸शालिग्राम केवल वही घर में रखे जो नित्य सेवा का संकल्प ले सके।





