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विस्तृत उत्तर
शरीर की दस वायु प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान, नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त और धनंजय बताई गई हैं। इन्हीं की प्रसन्नता को मरुतों का प्रसाद कहा गया है। पाठ में पाँच मुख्य वायुओं और पाँच उपवायुओं के काम भी समझाए गए हैं। जो साधक इन दस वायुओं को प्राणायाम से सिद्ध कर लेता है, वह शान्ति आदि चतुष्टय के प्रसाद को प्राप्त करता है।
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शास्त्रीय स्रोत
श्रीलिङ्गमहापुराण, पूर्वभाग, अध्याय 8, PDF पृष्ठ 47-48, श्लोक 60-66
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