विस्तृत उत्तर
## शिष्य का स्वरूप
शिष्य संस्कृत के 'शिष्' धातु से बना है जिसका अर्थ है — *जो शासित हो, जो सीखे, जो अनुशासन में रहे।*
शिष्य वह है जो गुरु के बताए मार्ग पर चलकर आध्यात्मिक उन्नति के लिए समर्पित हो।
### सनातन शास्त्र में शिष्य की परिभाषा
> 'आध्यात्मिक उन्नति हेतु जो गुरु द्वारा बताई साधना करता है, उसे 'शिष्य' कहते हैं।'
### आदर्श शिष्य के गुण
| गुण | महत्व |
|-----|-------|
| श्रद्धा | गुरु और शास्त्र पर अटूट विश्वास |
| समर्पण | गुरु-आज्ञा का पालन |
| जिज्ञासा | ज्ञान की तीव्र लालसा |
| विनम्रता | अहंकार का त्याग |
| सेवाभाव | गुरु और सहशिष्यों की सेवा |
| धैर्य | दीर्घकालीन साधना के लिए |
### महाभारत के आदर्श शिष्य
- ▸एकलव्य — द्रोणाचार्य की मूर्ति से शिक्षा लेकर धनुर्विद्या में पारंगत हुए
- ▸अर्जुन — श्रीकृष्ण के आदर्श शिष्य, जिन्होंने गुरु की हर बात मानी
- ▸आदि शंकराचार्य — गोविंदपादाचार्य के श्रेष्ठ शिष्य
### शिष्य का अधिकार
शास्त्रों के अनुसार 'पात्र शिष्य' को ही दीक्षा दी जाती है। पात्रता के लिए चाहिए:
- ▸मुमुक्षा — मोक्ष की तीव्र इच्छा
- ▸विवेक — सत्य-असत्य का भेद ज्ञान
- ▸वैराग्य — सांसारिक भोगों से विरक्ति
- ▸षट्सम्पत्ति — शम, दम, उपरति, तितिक्षा, श्रद्धा और समाधान
### शिष्यत्व का फल
> शिष्यत्व का महत्त्व यह है कि उसे देवऋण, ऋषिऋण, पितरऋण एवं समाजऋण चुकाने नहीं पड़ते — क्योंकि गुरुकृपा से वह इन सबसे मुक्त हो जाता है।





