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विस्तृत उत्तर
शिवात्मा वह कहलाता है जो मायायुक्त कर्मफल का त्याग करता है। पाठ में शिवात्मा की यही परिभाषा दी गई है। कर्म के फल की आसक्ति छोड़ना उसे शिव से सम्बद्ध आंतरिक स्थिति में रखता है। इसी श्लोक में सभी आसक्तियों से निवृत्त प्राणी को युक्त-योगी कहा गया है। इसलिए शिवात्मा और युक्त-योगी दोनों का आधार आसक्ति और फलाकांक्षा का त्याग है।
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शास्त्रीय स्रोत
श्रीलिङ्गमहापुराण, पूर्वभाग, अध्याय 10, PDF पृष्ठ 59, श्लोक 23
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