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शैव पद और वैराग्य📜 श्रीलिङ्गमहापुराण, पूर्वभाग, अध्याय 9, PDF पृष्ठ 56, श्लोक 52⏱ 1 मिनट पठन

सिद्धियाँ समाधि में विघ्न क्यों बनती हैं?

अंतिम अपडेट: 29 मई 2026
संक्षिप्त उत्तर

चौंसठ गुण व्यवहार में सिद्धि कहे जाते हैं, पर समाधि में वही उपसर्ग यानी विघ्न बन जाते हैं।

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विस्तृत उत्तर

सिद्धियाँ समाधि में विघ्न इसलिए बनती हैं क्योंकि वे साधक को आकर्षित कर सकती हैं। पाठ में चौंसठ गुणात्मक ऐश्वर्यों को व्यवहारकाल में सिद्धि कहा गया है, लेकिन समाधिकाल में वही उपसर्ग अर्थात् विघ्न कहे गए हैं। इसलिए इन्हें प्रयत्नपूर्वक परम वैराग्य से रोकना चाहिए। साधक यदि इन शक्तियों में उलझ जाता है, तो उसका चित्त समाधि के परम लक्ष्य से हट सकता है।

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शास्त्रीय स्रोत
श्रीलिङ्गमहापुराण, पूर्वभाग, अध्याय 9, PDF पृष्ठ 56, श्लोक 52
उत्तर को थोड़ा और स्पष्ट करें

सिद्धियाँ समाधि में विघ्न क्यों बनती हैं को संदर्भ सहित समझें

सिद्धियाँ समाधि में विघ्न क्यों बनती हैं का सबसे सीधा सार यह है: चौंसठ गुण व्यवहार में सिद्धि कहे जाते हैं, पर समाधि में वही उपसर्ग यानी विघ्न बन जाते हैं।

शैव पद और वैराग्य जैसे विषयों में यह देखना जरूरी होता है कि बात किस परिस्थिति में लागू होती है, किन नियमों के साथ मान्य होती है और व्यवहार में इसका सही अर्थ क्या निकलता है. उपलब्ध स्रोत श्रीलिङ्गमहापुराण, पूर्वभाग, अध्याय 9, PDF पृष्ठ 56, श्लोक 52 इस दिशा को मजबूत आधार देता है।

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उत्तर का शास्त्रीय आधार देखने के लिए श्रीलिङ्गमहापुराण, पूर्वभाग, अध्याय 9, PDF पृष्ठ 56, श्लोक 52 के उल्लेख को ध्यान से पढ़ें।

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शैव पद और वैराग्य श्रेणी के दूसरे प्रश्न इस उत्तर की सीमा और उपयोग दोनों स्पष्ट करते हैं।

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