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विस्तृत उत्तर
सिद्धियाँ समाधि में विघ्न इसलिए बनती हैं क्योंकि वे साधक को आकर्षित कर सकती हैं। पाठ में चौंसठ गुणात्मक ऐश्वर्यों को व्यवहारकाल में सिद्धि कहा गया है, लेकिन समाधिकाल में वही उपसर्ग अर्थात् विघ्न कहे गए हैं। इसलिए इन्हें प्रयत्नपूर्वक परम वैराग्य से रोकना चाहिए। साधक यदि इन शक्तियों में उलझ जाता है, तो उसका चित्त समाधि के परम लक्ष्य से हट सकता है।
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शास्त्रीय स्रोत
श्रीलिङ्गमहापुराण, पूर्वभाग, अध्याय 9, PDF पृष्ठ 56, श्लोक 52
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