विस्तृत उत्तर
सीताजी ने जयमाला श्रीरामचन्द्रजी को पहनाई।
धनुष भंग के बाद सीताजी सखियों के साथ रंगभूमि (यज्ञशाला) में आयीं। उनके हाथ में कमलके समान सुन्दर जयमाला शोभित थी। गुरुजनों और बड़े समाज की लाज से सीताजी सकुचा रही थीं, पर हृदय में रघुवीरजी को रखकर सखियों की ओर देखने लगीं।
दोहा — 'गुरजन लाज समाजु बड़ देखि सीय सकुचानि। लागि बिलोकन सखिन्ह तन रघुबीरहि उर आनि॥'
अर्थ — गुरुजनोंकी लाजसे तथा बहुत बड़े समाजको देखकर सीताजी सकुचा गयीं। वे श्रीरामचन्द्रजीको हृदयमें लाकर सखियोंकी ओर देखने लगीं।
फिर सीताजी ने प्रेमपूर्वक श्रीरामजी के गले में जयमाला पहना दी — सारे ब्रह्माण्ड में आनन्द छा गया।





