विस्तृत उत्तर
नारदजी संसार के दुखों का उपाय स्पष्ट करते हैं। वे कहते हैं कि पुरुषोत्तम भगवान श्रीकृष्ण के प्रति सभी कर्मों को समर्पित कर देना संसार के तीन तापों की एकमात्र औषधि है। सामान्य कर्म जन्म-मृत्यु के चक्र का कारण बनते हैं, पर भगवान को अर्पित होने पर वे बंधन काटने लगते हैं। ऐसे भगवदर्थ कर्म से भक्ति योग से संयुक्त ज्ञान प्राप्त होता है और साधक भगवान के नाम-गुण का कीर्तन-स्मरण करता है। नारदजी अपने अनुभव से कहते हैं कि विषयभोग की इच्छा से आतुर चित्त के लिए हरि लीला का वर्णन संसार-सागर पार करने की नौका है। काम और लोभ से घायल मन को कृष्ण सेवा से जैसी शांति मिलती है, वैसी अन्य साधनों से नहीं।
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