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विस्तृत उत्तर
सूतजी कहते हैं कि अठारह पुराणों में ग्यारहवाँ जो लिङ्गपुराण कहा गया है, उसका श्रवण उन्होंने व्यासजी से किया है। वे यह भी बताते हैं कि वे इसका वर्णन संक्षेप में कर रहे हैं, क्योंकि उन्होंने इसे विस्तार से नहीं सुना था। इस तरह सूतजी की कथन-परंपरा व्यासजी से जुड़े श्रवण पर आधारित बताई गई है।
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शास्त्रीय स्रोत
श्रीलिङ्गमहापुराण, पूर्वभाग, अध्याय 2, PDF पृष्ठ 15, श्लोक 3-4
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