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विस्तृत उत्तर
तप के रूप में ब्रह्मचर्य, मौन, निराहार, अहिंसा और सर्वविध शान्ति बताए गए हैं। पाठ में तप को केवल शरीर-कष्ट या उपवास तक सीमित नहीं किया गया। इसमें वाणी का संयम, आहार का नियंत्रण, हिंसा से निवृत्ति, ब्रह्मचर्य और शान्ति का भाव भी शामिल है। इसलिए तप एक संयमपूर्ण, अहिंसक और शांत जीवन-पद्धति के रूप में वर्णित है।
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शास्त्रीय स्रोत
श्रीलिङ्गमहापुराण, पूर्वभाग, अध्याय 10, PDF पृष्ठ 58, श्लोक 18
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