विस्तृत उत्तर
गुरु दीक्षा की अनिवार्यता कुलार्णव तंत्र और तंत्रालोक में विस्तार से वर्णित है:
दीक्षा = दिव्य क्षण
दीयते ज्ञानं क्षाल्यते पापं इति दीक्षा।' — जिसमें ज्ञान दिया जाए और पाप क्षय हो — वह दीक्षा है।
दीक्षा क्यों जरूरी — छह कारण
1मंत्र में प्राण
कुलार्णव: बिना दीक्षा के मंत्र 'मृत' है। गुरु दीक्षा से मंत्र में प्राण आता है — 'जीवित मंत्र' सिद्धि देता है।
2शक्तिपात
गुरु अपनी साधना-शक्ति (जो वर्षों की तपस्या से संचित है) शिष्य में प्रवाहित करते हैं। यह त्वरित साधना का मार्ग है।
3संस्कार शुद्धि
दीक्षा में गुरु शिष्य के पूर्व जन्मों के संस्कारों की शुद्धि करते हैं।
4अनुभव की विरासत
गुरु-शिष्य परंपरा में पीढ़ियों का अनुभव प्रवाहित होता है — पुस्तक से यह नहीं मिलता।
5सुरक्षा
दीक्षित शिष्य — गुरु के आभामंडल से सुरक्षित रहता है।
6तंत्रालोक
दीक्षाहीनस्य नासौ मंत्रो न शक्तिर्जायते।' — दीक्षाहीन को न मंत्र सिद्धि, न शक्ति।





