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विस्तृत उत्तर
वैकृत सर्ग पाँच बताए गए हैं। इनमें चौथा मुख्य सर्ग यानी वृक्षादि सृष्टि, पाँचवाँ तिर्यक् योनिवाले पशु-पक्षियों का सर्ग, छठा देवताओं का देवसर्ग, सातवाँ मनुष्यों का सर्ग और आठवाँ अनुग्रहसर्ग आता है। पाठ में कहा गया है कि प्रारम्भ के तीन प्राकृत हैं और ये पाँच वैकृत हैं। नौवाँ कौमार सर्ग दोनों प्रकार का है।
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शास्त्रीय स्रोत
श्रीलिङ्गमहापुराण, पूर्वभाग, अध्याय 5, PDF पृष्ठ 29, श्लोक 6-8
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