विस्तृत उत्तर
नारदजी साधनाओं का अंतिम प्रयोजन स्पष्ट करते हैं। वे कहते हैं कि मनुष्य की तपस्या, वेदों का श्रवण या अध्ययन, यज्ञ, स्वाध्याय, ज्ञान और दान का एक अविचल अर्थ है: पुण्यकीर्ति श्रीकृष्ण के गुणों और लीला का वर्णन। इसका अर्थ है कि वेदाध्ययन केवल विद्वता या वाद-विवाद के लिए नहीं, बल्कि भगवान की महिमा को समझने और कहने के लिए है। यदि साधना भगवान से न जुड़े तो वह पूर्ण फल नहीं देती। नारदजी ने इसी से पहले कहा कि अच्युत भाव से रहित निर्मल ज्ञान भी शोभा नहीं पाता। इसलिए वेद पढ़ने का अंतिम उद्देश्य भगवान के नाम, गुण, यश और लीला में प्रवेश कराना है, जिससे ज्ञान भक्ति से संयुक्त हो जाता है।
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