विस्तृत उत्तर
वेदों को बाँटने का कार्य भगवान के कलावतार योगीराज व्यासजी से जुड़ा है। उन्होंने देखा कि समय के प्रभाव से युग-युग में धर्म-संकरता होती है, भौतिक वस्तुओं की शक्ति घटती है और लोग श्रद्धाहीन, अशक्त, अल्पबुद्धि तथा अल्पायु हो जाते हैं। सब वर्ण और आश्रमों का हित कैसे हो, यह सोचकर उन्होंने वेदोक्त चातुर्होत्र कर्म को हृदय-शुद्धि करने वाला माना। यज्ञ का विस्तार करने के लिए उन्होंने एक ही वेद के चार विभाग किए। ऋक, यजुः, साम और अथर्व ये चार वेद इसी विभाजन से अलग किए गए। आगे कहा गया कि कम समझ और कम स्मरणशक्ति वाले लोगों पर कृपा करके व्यासजी ने ऐसा विभाजन किया, ताकि वे भी वेदों को धारण कर सकें।
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