विस्तृत उत्तर
भगवान के विराट पुरुष रूप को विशुद्ध सत्त्वमय श्रेष्ठ रूप कहा गया है। उसके अंग-प्रत्यंग में ही समस्त लोकों की कल्पना की गई है। योगी लोग दिव्य दृष्टि से उस रूप का दर्शन करते हैं। उसका वर्णन अत्यंत विलक्षण रूप में है: हजारों पैर, जाँघें, भुजाएँ और मुख; हजारों सिर, कान, आँखें और नासिकाएँ। वह हजारों मुकुट, वस्त्र, कुंडल आदि आभूषणों से शोभायमान है। यह वर्णन साधारण शरीर का नहीं, बल्कि विश्व को धारण करने वाले दिव्य पुरुष रूप का है। इसी पुरुष रूप को नारायण कहा गया और इसे अनेक अवतारों का मूल, अक्षय भंडार और बीज बताया गया है।
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