विस्तृत उत्तर
यज्ञ रक्षा और अहल्या उद्धार के बाद विश्वामित्रजी श्रीराम-लक्ष्मण को लेकर जनकपुर (मिथिला/विदेहनगर) गये — जहाँ राजा जनक का धनुष-यज्ञ होने वाला था।
चौपाई — 'चले राम लछिमन मुनि संगा। गए जहाँ जग पावनि गंगा। गाधिसूनु सब कथा सुनाई। जेहि प्रकार सुरसरि महि आई॥'
अर्थ — श्रीरामजी और लक्ष्मणजी मुनिके साथ चले। वे वहाँ गये, जहाँ जगत्को पवित्र करनेवाली गंगाजी थीं। महाराज गाधिके पुत्र विश्वामित्रजीने वह सब कथा कह सुनायी जिस प्रकार देवनदी गंगाजी पृथ्वीपर आयी थीं।
गंगा-स्नान के बाद मुनिबृन्द के साथ शीघ्र विदेह (जनक) की नगरी (जनकपुर) के निकट आ गये।





