विस्तृत उत्तर
याज्ञवल्क्य-भरद्वाज संवाद तीर्थराज प्रयाग (प्रयागराज) में हुआ।
चौपाई — 'तहाँ होइ मुनि रिषय समाजा। जाहिं जे मज्जन तीरथराजा। मज्जहिं प्रात समेत उछाहा। कहहिं परसपर हरि गुन गाहा॥'
इसका अर्थ — तीर्थराज प्रयागमें जो स्नान करने जाते हैं उन ऋषि-मुनियोंका समाज वहाँ (भरद्वाजजीके आश्रममें) जुटता है। प्रातःकाल सब उत्साहपूर्वक स्नान करते हैं और फिर परस्पर भगवान्के गुणोंकी कथाएँ कहते हैं।
माघ मेले के अवसर पर ऋषि-मुनि प्रयाग में भरद्वाजजी के आश्रम में एकत्र होते थे। एक बार माघ स्नान समाप्त होने पर जब सब मुनि अपने-अपने आश्रमों को लौट गये, तब परम ज्ञानी याज्ञवल्क्य मुनिको भरद्वाजजीने पकड़कर रख लिया और उनसे रामकथा सुनने की प्रार्थना की।
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