विस्तृत उत्तर
श्रीमद्भागवतमाहात्म्य में यमराज के भय से मुक्ति का आधार भक्ति बताया गया है। नारदजी कहते हैं कि कलियुग में जो जीव भक्ति से युक्त होंगे, वे पापी होने पर भी निर्भय होकर भगवान श्रीकृष्ण के अभय धाम को प्राप्त होंगे। इसके बाद वे कहते हैं कि जिनके हृदय में सदा प्रेमरूपिणी भक्ति निवास करती है, वे निर्मल अंतःकरण वाले पुरुष स्वप्न में भी यमराज को नहीं देखते। यह कथन इसी वर्णन की भक्ति-महिमा का भाग है। इसलिए स्रोत के अनुसार यमराज का भय भक्ति से मिटता है; जब हृदय में प्रेममयी भक्ति स्थिर हो जाती है, तब जीव भगवान के अभय धाम की ओर अग्रसर होता है और मृत्यु-भय से मुक्त होता है।
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