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विस्तृत उत्तर
योग में शरीर के तीन मुख्य स्थान बताए गए हैं। गले से नीचे और नाभि से ऊपर बारह अंगुल परिमाण वाला हृत्कमल योग के लिये उत्तम स्थान है। नाभि से नीचे मूलाधार नामक स्थान भी योगस्थान कहा गया है। दोनों भृकुटियों के मध्य आवर्त, जिसे आज्ञाचक्र कहा गया है, वह भी योग का स्थान है। ये स्थान भगवान् शंकर द्वारा जगत् के हित के लिये कल्पित योगस्थानों के रूप में बताए गए हैं।
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शास्त्रीय स्रोत
श्रीलिङ्गमहापुराण, पूर्वभाग, अध्याय 8, PDF पृष्ठ 41, श्लोक 1-2
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