विस्तृत उत्तर
योगी ब्रह्मा से स्थावर तक संसार को ऐसे देखता है जैसे हाथ में रखे आँवले को देखा जाता है। पाठ में कहा गया है कि ब्रह्मा से लेकर स्थावरपर्यन्त समग्र संसार उस योगी के लिये हस्तामलकतुल्य हो जाता है। इसके साथ उसके भीतर हजारों प्रकार के विज्ञान उत्पन्न होने और सतत अभ्यास से उस विशुद्ध विज्ञान के स्थिर रहने की बात कही गई है। इसलिए यह व्यापक दर्शन योगाभ्यास से स्थिर हुए ज्ञान का फल है।
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