ऋषि भद्र कथा (मन्दिर-नाम-व्युत्पत्ति-स्रोत)
ऋषि भद्र — पर्वत-राज मेरु एवं अप्सरा मेनका के पुत्र (एक अन्य-स्रोत: 'वेरु देवी' — लघु-विभिन्नता)। नारद-मुनि ने उन्हें राम-मन्त्र-दीक्षा दी; उन्होंने दण्डकारण्य-गोदावरी-तट पर तपस्या की। श्री राम ने (वन-वास-काल) उनको दर्शन-पश्चात् लौटने-पर मुक्ति-प्रदान का वचन दिया, परन्तु राम-स्वरूप में नहीं लौटे। ऋषि भद्र ने पारम्परिक-कथन-अनुसार अगले-युग में तपस्या-जारी रखी। अन्ततः विष्णु ने वैकुण्ठ-राम-रूप (सीता एवं लक्ष्मण-सहित) में प्रकट होकर ऋषि भद्र के अनुरोध-पर अपने श्रीपाद उनके सिर पर रखे — वे स्वयं पर्वत बन गए। इसलिए मन्दिर-स्थल 'भद्रा-चलम्' (भद्र + अचलम् = भद्र-पर्वत) नाम-धारी हुआ।
