रावण-आत्म-लिङ्ग-वस्त्र-गिरने कथा (मुरुदेश्वर-नाम-व्युत्पत्ति)
त्रेता-युग पारम्परिक-कथा: रावण ने भगवान् शिव से आत्म-लिङ्ग प्राप्त कर लंका-यात्रा-प्रारम्भ की। गणेश-बाल-ब्राह्मण-रूप-में रावण को छल-कर गोकर्ण-स्थल पर लिङ्ग भूमि-स्थापित कराई (लिङ्ग वहाँ स्थिर-हो गया = गोकर्ण-महाबलेश्वर)। क्रोध-में रावण ने आत्म-लिङ्ग-केस के विभिन्न-भागों को विभिन्न-दिशाओं में फेंका — वस्त्र (आवरण) कनडुक-गिरि-पर्वत पर 'मृडेश्वर'-स्थल पर गिरा (इसलिए 'मृडेश' → मुरुदेश्वर नाम)। अन्य-स्थल: सज्जेश्वर (सज्जा-सजावट-डोरी) + गुनेश्वर (केस-ढक्कन) + धारेश्वर (केस-स्वयं) — ये सब + गोकर्ण = पञ्च-क्षेत्र-क्लस्टर पारम्परिक (आंशिक-सत्यापित — flag)। मुख्य-गर्भगृह-लिङ्ग आत्म-लिङ्ग-का छोटा-अंश मान्यता-अनुसार स्वयम्भू-स्वरूप; भूमि-तल-नीचे ~2 फीट।
