श्रीसूक्त में माँ लक्ष्मी का स्वरूप
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अभय मुद्रा और वरद मुद्रा का क्या अर्थ है?
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संक्षिप्त उत्तर
अभय मुद्रा = भक्तों को दरिद्रता, भय और जीवन के संकटों से सुरक्षा। वरद मुद्रा = असीम उदारता और सत्कामनाओं की पूर्ति। जिनके पास श्री है उनका कर्तव्य समाज को भयमुक्त करना और दान देना है।
देवी के हाथों में दो प्रमुख मुद्राएँ हैं: अभय मुद्रा: यह भक्तों को दरिद्रता, भय और जीवन के संकटों से अभय (सुरक्षा) प्रदान करता है।
वरद मुद्रा: यह देवी की असीम उदारता और सभी सत्कामनाओं की पूर्ति का परिचायक है।
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