शंकराचार्य: 'ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या, जीवो ब्रह्मैव नापरः।' आत्मा ब्रह्म ही है — अज्ञान (माया) के कारण भेद दिखता है। घड़े का आकाश = महाआकाश, लहर = समुद्र। चारों महावाक्य यही कहते हैं। अज्ञान हटना ही म
अद्वैत वेदांत (आदि शंकराचार्य) का मूल सिद्धांत है: जीवात्मा और परम ब्रह्म एक ही हैं — दोनों में कोई भेद नहीं।
मूल सिद्धांत: - 'ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या, जीवो ब्रह्मैव नापरः' (शंकराचार्य) — ब्रह्म ही एकमात्र सत्य है, जगत मिथ्या (माया) है, और जीव ब्रह्म ही है, कुछ और नहीं।