विस्तृत उत्तर
अद्वैत वेदांत (आदि शंकराचार्य) का मूल सिद्धांत है: जीवात्मा और परम ब्रह्म एक ही हैं — दोनों में कोई भेद नहीं।
मूल सिद्धांत
- ▸'ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या, जीवो ब्रह्मैव नापरः' (शंकराचार्य)
— ब्रह्म ही एकमात्र सत्य है, जगत मिथ्या (माया) है, और जीव ब्रह्म ही है, कुछ और नहीं।
आत्मा = ब्रह्म कैसे?
- 1अज्ञान (अविद्या) का आवरण: जीवात्मा वास्तव में ब्रह्म ही है, परंतु अज्ञान (अविद्या/माया) के कारण उसे अपनी सीमितता का भ्रम होता है। जैसे रस्सी में साँप का भ्रम — साँप कभी था ही नहीं, केवल भ्रम था।
- 1उपाधि भेद: जैसे एक ही आकाश को घड़े में बंद करने पर 'घटाकाश' कहते हैं, पर घड़ा टूटने पर वह महाकाश में विलीन हो जाता है — वैसे ही शरीर (उपाधि) के कारण आत्मा सीमित दिखती है, पर वास्तव में वह असीम ब्रह्म ही है।
- 1महावाक्य प्रमाण:
- ▸*'तत्त्वमसि'* (छांदोग्य उपनिषद) — वह (ब्रह्म) तू ही है।
- ▸*'अहं ब्रह्मास्मि'* (बृहदारण्यक उपनिषद) — मैं ब्रह्म हूँ।
- ▸*'प्रज्ञानं ब्रह्म'* (ऐतरेय उपनिषद) — चेतना ही ब्रह्म है।
- ▸*'अयमात्मा ब्रह्म'* (माण्डूक्य उपनिषद) — यह आत्मा ब्रह्म है।
- 1दृष्टांत: जैसे समुद्र की लहर समुद्र से भिन्न दिखती है पर है जल ही — वैसे ही जीवात्मा ब्रह्म से भिन्न दिखती है पर है ब्रह्म ही।
मोक्ष: जब अज्ञान (माया) हटता है और आत्मज्ञान होता है — तब जीव को अनुभव होता है 'मैं ब्रह्म हूँ' — यही मोक्ष है। कोई नई प्राप्ति नहीं, केवल अज्ञान का निवारण।





