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दर्शन📜 मांडूक्य उपनिषद, बृहदारण्यक उपनिषद, शंकराचार्य विवेकचूड़ामणि, ब्रह्मसूत्र भाष्य2 मिनट पठन

अद्वैत वेदांत के अनुसार आत्मा और ब्रह्म एक कैसे?

संक्षिप्त उत्तर

शंकराचार्य: 'ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या, जीवो ब्रह्मैव नापरः।' आत्मा ब्रह्म ही है — अज्ञान (माया) के कारण भेद दिखता है। घड़े का आकाश = महाआकाश, लहर = समुद्र। चारों महावाक्य यही कहते हैं। अज्ञान हटना ही मोक्ष है।

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विस्तृत उत्तर

अद्वैत वेदांत (आदि शंकराचार्य) का मूल सिद्धांत है: जीवात्मा और परम ब्रह्म एक ही हैं — दोनों में कोई भेद नहीं।

मूल सिद्धांत

  • 'ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या, जीवो ब्रह्मैव नापरः' (शंकराचार्य)

— ब्रह्म ही एकमात्र सत्य है, जगत मिथ्या (माया) है, और जीव ब्रह्म ही है, कुछ और नहीं।

आत्मा = ब्रह्म कैसे?

  1. 1अज्ञान (अविद्या) का आवरण: जीवात्मा वास्तव में ब्रह्म ही है, परंतु अज्ञान (अविद्या/माया) के कारण उसे अपनी सीमितता का भ्रम होता है। जैसे रस्सी में साँप का भ्रम — साँप कभी था ही नहीं, केवल भ्रम था।
  1. 1उपाधि भेद: जैसे एक ही आकाश को घड़े में बंद करने पर 'घटाकाश' कहते हैं, पर घड़ा टूटने पर वह महाकाश में विलीन हो जाता है — वैसे ही शरीर (उपाधि) के कारण आत्मा सीमित दिखती है, पर वास्तव में वह असीम ब्रह्म ही है।
  1. 1महावाक्य प्रमाण:
  • *'तत्त्वमसि'* (छांदोग्य उपनिषद) — वह (ब्रह्म) तू ही है।
  • *'अहं ब्रह्मास्मि'* (बृहदारण्यक उपनिषद) — मैं ब्रह्म हूँ।
  • *'प्रज्ञानं ब्रह्म'* (ऐतरेय उपनिषद) — चेतना ही ब्रह्म है।
  • *'अयमात्मा ब्रह्म'* (माण्डूक्य उपनिषद) — यह आत्मा ब्रह्म है।
  1. 1दृष्टांत: जैसे समुद्र की लहर समुद्र से भिन्न दिखती है पर है जल ही — वैसे ही जीवात्मा ब्रह्म से भिन्न दिखती है पर है ब्रह्म ही।

मोक्ष: जब अज्ञान (माया) हटता है और आत्मज्ञान होता है — तब जीव को अनुभव होता है 'मैं ब्रह्म हूँ' — यही मोक्ष है। कोई नई प्राप्ति नहीं, केवल अज्ञान का निवारण।

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शास्त्रीय स्रोत
मांडूक्य उपनिषद, बृहदारण्यक उपनिषद, शंकराचार्य विवेकचूड़ामणि, ब्रह्मसूत्र भाष्य
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