विस्तृत उत्तर
आदि शंकराचार्य (788-820 ई. अनुमानित) ने अद्वैत वेदांत दर्शन की स्थापना की। इसे सरल भाषा में समझें:
अद्वैत = अ + द्वैत = दो नहीं = एक ही
तीन मुख्य बातें
- 1ब्रह्म ही एकमात्र सत्य है:
पूरे ब्रह्मांड में एक ही सत्ता (Reality) है — वह है ब्रह्म (परमात्मा)। वह निर्गुण (गुणरहित), निराकार, अनंत और शाश्वत है।
- 1जगत मिथ्या (भ्रम) है:
जो संसार हमें दिखता है — पेड़, पहाड़, लोग, सुख-दुख — यह सब माया (भ्रम) है। जैसे सपने में देखी दुनिया जागने पर असत्य हो जाती है, वैसे ही ज्ञान होने पर यह जगत असत्य सिद्ध होता है। मिथ्या का अर्थ 'है ही नहीं' नहीं, बल्कि 'जैसा दिखता है वैसा नहीं है।'
- 1जीव और ब्रह्म एक हैं:
हमारे अंदर जो 'मैं' का बोध है — वह आत्मा ब्रह्म ही है। अज्ञान के कारण हम अपने को शरीर, मन, नाम आदि से जोड़ते हैं — जबकि असलियत में हम शुद्ध चैतन्य ब्रह्म हैं।
सरल उदाहरण
- ▸रस्सी और साँप: अंधेरे में रस्सी को साँप समझ लेना — साँप कभी था ही नहीं, केवल अज्ञान था। प्रकाश (ज्ञान) आने पर भ्रम दूर हो गया। वैसे ही जगत (साँप) ब्रह्म (रस्सी) पर अज्ञान का प्रक्षेपण है।
- ▸सोना और आभूषण: कंगन, अंगूठी, हार — सब अलग दिखते हैं पर सब सोना ही हैं। वैसे ही सब कुछ ब्रह्म है।
मोक्ष कैसे?
- ▸ज्ञान (आत्मबोध) से अज्ञान दूर होता है।
- ▸'मैं शरीर नहीं, मैं मन नहीं, मैं शुद्ध आत्मा (ब्रह्म) हूँ' — यह अनुभव ही मोक्ष है।
- ▸श्रवण (सुनना), मनन (विचार), निदिध्यासन (गहन चिंतन) — यह मोक्ष का मार्ग है।





