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दर्शन📜 शंकराचार्य — विवेकचूड़ामणि (श्लोक 20), ब्रह्मसूत्र भाष्य2 मिनट पठन

'जगत मिथ्या, ब्रह्म सत्य' — का अर्थ क्या?

संक्षिप्त उत्तर

शंकराचार्य (विवेकचूड़ामणि): ब्रह्म = परम सत्य, जगत = मिथ्या (न सत् न असत् — अनिर्वचनीय), जीव = ब्रह्म ही। 'मिथ्या' ≠ झूठा। रस्सी-साँप/स्वप्न उदाहरण। व्यावहारिक सत्ता (जगत सत्य) vs पारमार्थिक सत्ता (केवल ब्रह्म)।

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विस्तृत उत्तर

ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या, जीवो ब्रह्मैव नापरः' — यह आदि शंकराचार्य के अद्वैत वेदांत का सारवाक्य है।

अर्थ

  • ब्रह्म सत्यम् — ब्रह्म ही एकमात्र परम सत्य है।
  • जगत् मिथ्या — यह दृश्य जगत (संसार) मिथ्या है।
  • जीवो ब्रह्मैव नापरः — जीवात्मा ब्रह्म ही है, कुछ और नहीं।

'मिथ्या' का सही अर्थ (बहुत महत्वपूर्ण)

मिथ्या' का अर्थ 'झूठा' या 'अस्तित्वहीन' नहीं है। शंकराचार्य के अनुसार:
  • सत् = जो सदा है, कभी बदलता नहीं (ब्रह्म)।
  • असत् = जो कभी था ही नहीं (जैसे आकाश-कमल, खरगोश के सींग)।
  • मिथ्या = जो न पूर्णतः सत् है, न पूर्णतः असत् — अनिर्वचनीय। जगत इसी श्रेणी में है — यह अनुभव होता है (इसलिए असत् नहीं), पर ज्ञान होने पर इसका वास्तविक स्वरूप बदल जाता है (इसलिए सत् नहीं)।

उदाहरण

  • रस्सी-साँप: अंधेरे में रस्सी साँप दिखती है — साँप मिथ्या है (न पूर्णतः सत् — क्योंकि प्रकाश में गायब, न असत् — क्योंकि अनुभव हुआ)। प्रकाश (ज्ञान) आने पर केवल रस्सी (ब्रह्म) दिखती है।
  • स्वप्न: सपने में देखी दुनिया 'मिथ्या' है — सपने में सत्य लगी पर जागने पर असत्य। वैसे ही यह जाग्रत जगत भी ब्रह्मज्ञान होने पर 'मिथ्या' सिद्ध होता है।

आलोचना और उत्तर

  • रामानुज ने इसका खंडन किया: जगत ब्रह्म ने रचा है, अतः मिथ्या नहीं हो सकता।
  • अद्वैत उत्तर: व्यावहारिक दृष्टि से जगत सत्य है (व्यावहारिक सत्ता), पारमार्थिक दृष्टि से केवल ब्रह्म सत्य है (पारमार्थिक सत्ता)।
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शास्त्रीय स्रोत
शंकराचार्य — विवेकचूड़ामणि (श्लोक 20), ब्रह्मसूत्र भाष्य
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