विस्तृत उत्तर
ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या, जीवो ब्रह्मैव नापरः' — यह आदि शंकराचार्य के अद्वैत वेदांत का सारवाक्य है।
अर्थ
- ▸ब्रह्म सत्यम् — ब्रह्म ही एकमात्र परम सत्य है।
- ▸जगत् मिथ्या — यह दृश्य जगत (संसार) मिथ्या है।
- ▸जीवो ब्रह्मैव नापरः — जीवात्मा ब्रह्म ही है, कुछ और नहीं।
'मिथ्या' का सही अर्थ (बहुत महत्वपूर्ण)
मिथ्या' का अर्थ 'झूठा' या 'अस्तित्वहीन' नहीं है। शंकराचार्य के अनुसार:
- ▸सत् = जो सदा है, कभी बदलता नहीं (ब्रह्म)।
- ▸असत् = जो कभी था ही नहीं (जैसे आकाश-कमल, खरगोश के सींग)।
- ▸मिथ्या = जो न पूर्णतः सत् है, न पूर्णतः असत् — अनिर्वचनीय। जगत इसी श्रेणी में है — यह अनुभव होता है (इसलिए असत् नहीं), पर ज्ञान होने पर इसका वास्तविक स्वरूप बदल जाता है (इसलिए सत् नहीं)।
उदाहरण
- ▸रस्सी-साँप: अंधेरे में रस्सी साँप दिखती है — साँप मिथ्या है (न पूर्णतः सत् — क्योंकि प्रकाश में गायब, न असत् — क्योंकि अनुभव हुआ)। प्रकाश (ज्ञान) आने पर केवल रस्सी (ब्रह्म) दिखती है।
- ▸स्वप्न: सपने में देखी दुनिया 'मिथ्या' है — सपने में सत्य लगी पर जागने पर असत्य। वैसे ही यह जाग्रत जगत भी ब्रह्मज्ञान होने पर 'मिथ्या' सिद्ध होता है।
आलोचना और उत्तर
- ▸रामानुज ने इसका खंडन किया: जगत ब्रह्म ने रचा है, अतः मिथ्या नहीं हो सकता।
- ▸अद्वैत उत्तर: व्यावहारिक दृष्टि से जगत सत्य है (व्यावहारिक सत्ता), पारमार्थिक दृष्टि से केवल ब्रह्म सत्य है (पारमार्थिक सत्ता)।





