विस्तृत उत्तर
द्वैत और अद्वैत वेदांत दर्शन की दो प्रमुख शाखाएँ हैं जो ब्रह्म, जीव और जगत के संबंध को भिन्न-भिन्न दृष्टिकोण से समझाती हैं।
अद्वैत वेदांत (शंकराचार्य — 788-820 ई.)
- ▸मूल सिद्धांत: *'ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या, जीवो ब्रह्मैव नापरः'*
- ▸ब्रह्म: एकमात्र सत्य, निर्गुण, निराकार।
- ▸जीव: ब्रह्म ही है, अज्ञान (माया) के कारण अलग दिखता है।
- ▸जगत: मिथ्या (भ्रम) — रस्सी में साँप की तरह।
- ▸मोक्ष: ज्ञान से अज्ञान हटना = मोक्ष। 'अहं ब्रह्मास्मि' का अनुभव।
- ▸भेद: जीव और ब्रह्म में कोई भेद नहीं — भेद केवल भ्रम।
द्वैत वेदांत (मध्वाचार्य — 1238-1317 ई.)
- ▸मूल सिद्धांत: ब्रह्म, जीव और जगत — तीनों सत्य और शाश्वत, परंतु परस्पर भिन्न।
- ▸ब्रह्म: सगुण, सर्वोच्च, स्वतंत्र। विष्णु (नारायण) = परम ब्रह्म।
- ▸जीव: ब्रह्म पर निर्भर, पर ब्रह्म से सदा भिन्न।
- ▸जगत: सत्य — मिथ्या नहीं। ब्रह्म ने रचा है।
- ▸मोक्ष: ईश्वर भक्ति और कृपा से। मोक्ष में भी जीव ब्रह्म से भिन्न रहता है (सायुज्य नहीं, सामीप्य)।
- ▸पंच भेद: (1) ईश्वर-जीव (2) ईश्वर-जड़ (3) जीव-जीव (4) जीव-जड़ (5) जड़-जड़ — ये पांच भेद नित्य (शाश्वत) हैं।
मुख्य अंतर
| विषय | अद्वैत (शंकर) | द्वैत (मध्व) |
|-------|---------------|---------------|
| ब्रह्म-जीव | एक ही | सदा भिन्न |
| जगत | मिथ्या | सत्य |
| माया | अविद्या/भ्रम | ईश्वर शक्ति (सत्य) |
| मोक्ष | ज्ञान से | भक्ति + ईश्वर कृपा |
| मोक्ष में | जीव = ब्रह्म | जीव ≠ ब्रह्म (सामीप्य) |
तत्त्वमसि की भिन्न व्याख्या
- ▸अद्वैत: 'वह (ब्रह्म) तू है' — एकता।
- ▸द्वैत: 'तू उसका (ब्रह्म का) है' — निर्भरता, भिन्नता।





